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नदियों में फेंके जा रहे थे बच्चे, भूख से तड़पता भारत; आसान नहीं था सुपर पावर बनने तक का सफर

भारत ने पिछले 78 सालों में न सिर्फ देश की अर्थव्यवस्था को आसमान की उचाइयों तक पहुंचाया है बल्कि भारत ने सैन्य शक्ति को मजबूत किया और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की.

भारत को अंग्रेजों से 15 अगस्त 1947 में आजादी तो मिली गई थी. लेकिन, आजाद होने तक यहां की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी. आज से 78 साल, यानी भारत को आजादी मिलने से 4 साल पहले बंगाल (मौजूदा बांग्लादेश, भारत का पश्चिम बंगाल, बिहार और उड़ीसा) ने अकाल का वो भयानक दौर देखा लिया था, जिसमें 30 लाख से ज्यादा लोगों ने भूख से तड़पकर अपनी जान दे दी थी. 

वो दौर द्वितीय विश्वयुद्ध का था. माना जाता है कि उस वक्त अकाल के कारण अनाज का उत्पादन काफी कम हो गया था. लेखक मधुश्री मुखर्जी ने 1943 के अकाल से बच निकले लोगों से बातचीत के आधार पर अपनी एक किताब में बताया है कि उस वक्त हालात ऐसे थे कि लोग भूख से तड़प रहे थे, अपने बच्चों को नदी में फेंक रहे थे. यहां तक कई लोगों ने ट्रेन के सामने कूदकर अपनी जान तक दे दी थी. 

उसी किताब में इस बात का भी जिक्र है कि लोग पत्तियां और घास खाकर जिंदा थे. हालात इतने खराब थे कि लोगों में सरकार की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन करने का भी दम नहीं बचा था. इस अकाल से उन्हीं लोगों की जान बच पाई जो रोजगार की तलाश में कोलकाता (कलकत्ता) चले आए या वे महिलाएं जिन्होंने परिवार को पालने के लिए मजबूरी में वेश्यावृत्ति करनी शुरू कर दी थी. 

बंगाल का अकाल 1943 में घटित एक अत्यंत दुखद और भयावह त्रासदी थी जिसने बंगाल, भारत के एक बड़े हिस्से को अपनी चपेट में ले लिया था. इस अकाल ने लगभग 20 से 30 लाख लोगों की जान चली गई थी और लाखों लोगों को बेघर और निराश्रित कर दिया था. 

यह अकाल न केवल खाद्यान्न की कमी से उत्पन्न हुआ था, बल्कि इसमें ब्रिटिश औपनिवेशिक नीतियों और युद्धकालीन परिस्थितियों की महत्वपूर्ण भूमिका थी. आजादी मिलने से पहले बंगाल का अकाल और आजादी के वक्त बंटवारे ने इस देश की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त कर दिया था.


बंगाल के अकाल का आर्थिक प्रभाव
अकाल के कारण कृषि उत्पादन में भारी गिरावट आई, जिससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई. वहीं खाद्यान्नों की कमी के कारण उनके मूल्य आसमान छू गए, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के लोग गंभीर रूप से प्रभावित हुए. 

अकाल के चलते बड़े पैमाने पर लोग रोजगार से वंचित हो गए और गरीबी ने विकराल रूप धारण कर लिया. आजादी से पहले आए इस अकाल ने न सिर्फ अर्थव्यवस्था बल्कि सामाजिक संरचना को भी ध्वस्त कर दिया. लोगों की भूख और बीमारी से मौतें हुईं, और कई परिवार बर्बाद हो गए.

1947 के विभाजन का क्या पड़ा देश पर असर 

भारत के विभाजन के समय देश को दो स्वतंत्र राष्ट्रों- भारत और पाकिस्तान में विभाजित कर दिया गया. यह विभाजन सांप्रदायिक आधार पर किया गया, जिससे बड़े पैमाने पर हिंसा और मुस्लिम विस्थापन हुआ.

विभाजन के समय भारत और पाकिस्तान के बीच संपत्तियों, संसाधनों, और उद्योगों का बंटवारा हुआ. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा आघात लगा. महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र जैसे कि लाहौर, कराची और रावलपिंडी पाकिस्तान में चले गए. 

वहीं विभाजन के कारण व्यापारिक मार्ग बाधित हो गए और कई उद्योगों को बंद करना पड़ा. खासकर पंजाब और बंगाल जैसे क्षेत्रों में भारी नुकसान हुआ, जो विभाजन से सबसे अधिक प्रभावित हुए. विभाजन के दौरान भारतीय रिज़र्व बैंक से पाकिस्तान को नई मुद्रा जारी करनी पड़ी, जिससे मुद्रा संकट उत्पन्न हो गया.

सामाजिक और मानव संकट

भारत को दो अलग अलग देशों में बांटे जाने के कारण यहां से लाखों लोग विस्थापित हो गए. दोनों देशों के बीच बड़े पैमाने पर पलायन हुआ, जिसमें संपत्ति और जीवन का भारी नुकसान हुआ. विभाजन के समय व्यापक पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा हुई, जिससे मानव जीवन और संपत्ति की भारी हानि हुई. इसने समाज में तनाव और अस्थिरता को जन्म दिया.

भारत में बड़ी संख्या में शरणार्थी आए, जिन्हें बसाने और उन्हें जीवन यापन के साधन उपलब्ध कराने में सरकार को भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

अर्थव्यवस्था पर समग्र प्रभाव

अकाल और विभाजन ने भारतीय अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया. देश के वित्तीय संसाधन बुरी तरह से प्रभावित हुई, जिससे सरकार को भारी आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा. वहीं विभाजन के कारण देश के कई प्रमुख उद्योग बंद हो गए जिससे उद्योग जगत को भारी नुकसान हुआ.

इन घटनाओं ने भारतीय समाज को विभाजित कर दिया. अकाल और विभाजन के कारण उत्पन्न गरीबी, बेरोजगारी, और सांप्रदायिक तनाव ने सामाजिक संरचना को कमजोर कर दिया. यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद भारत को पुनर्निर्माण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा. बंटवारे और अकाल से उत्पन्न आर्थिक और सामाजिक चुनौतियों से निपटने के लिए नई सरकार को महत्वपूर्ण आर्थिक और प्रशासनिक सुधार करने पड़े. 

गुलामी से निकलकर भारत के सुपर पावर बनने की पूरी कहानी?

भारत का अंग्रेजों की गुलामी से निकलकर एक स्वतंत्र राष्ट्र बनने और फिर एक वैश्विक सुपर पावर बनने की कहानी प्रेरणादायक और संघर्षों से भरी हुई है. इस कहानी को 6 प्वाइंट में समझिए 

1. औपनिवेशिक शासन और संघर्ष का आरंभ (1757-1857): 

प्लासी का युद्ध (1757): इस युद्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को हराया, जिससे ब्रिटिशों का भारत में आधिपत्य शुरू हुआ.

औद्योगिक शोषण: ब्रिटिश शासन के दौरान भारत के संसाधनों का अत्यधिक दोहन हुआ. उन्होंने भारतीय कुटीर उद्योगों को नष्ट कर दिया और भारतीय अर्थव्यवस्था को अपने हित में ढाल लिया.

2. 1857 का विद्रोह और स्वतंत्रता संग्राम (1857-1947):

1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: यह भारतीय सिपाहियों द्वारा अंग्रेजी शासन के खिलाफ पहला बड़ा विद्रोह था, जिसे अंग्रेजों ने दबा दिया, लेकिन इसने भारत में राष्ट्रीय चेतना की नींव रखी.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन (1885): यह संगठन स्वतंत्रता संग्राम के लिए एक महत्वपूर्ण मंच बना और महात्मा गांधी के नेतृत्व में अहिंसात्मक आंदोलन चलाए गए.

महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले इन आंदोलनों ने स्वतंत्रता संग्राम को नया बल दिया. इसके बाद 1942 में शुरू हुए भारत छोड़ो आंदोलन ने देशभर में स्वतंत्रता की मांग को और तेज किया.

3. स्वतंत्रता और विभाजन (1947):

भारत को 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता मिली. इसी वक्त भारत का विभाजन भी हुआ, जिससे पाकिस्तान का गठन हुआ. विभाजन के दौरान बड़े पैमाने पर सांप्रदायिक हिंसा और विस्थापन हुआ.

इसके बाद 26 जनवरी 1950 को भारत ने अपना संविधान लागू किया, जिसने भारत को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया. भारत ने औद्योगीकरण, हरित क्रांति, और पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से कृषि और उद्योग में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में कदम बढ़ाए. इसके बाद शीत युद्ध के दौरान गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व किया और एक स्वतंत्र विदेश नीति अपनाई.

4. आर्थिक उदारीकरण और वैश्विक शक्ति के रूप में उभरना (1991-वर्तमान):

साल 1991 में भारत ने आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण, और वैश्वीकरण की नीति अपनाई, जिससे इस देश की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ी. धीरे धीरे भारत ने आईटी और सेवा क्षेत्र में तेजी से प्रगति की और जल्द ही यह देश वैश्विक आईटी हब बन गया.

भारत ने सैन्य शक्ति को मजबूत किया और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी में भी बड़ी उपलब्धियां हासिल की, जैसे मंगलयान मिशन और चंद्रयान मिशन. इसके अलावा इस देश मे वैश्विक मंचों पर भी अपनी उपस्थिति को मजबूत किया और अलग अलग देशों के साथ मजबूत आर्थिक और सामरिक संबंध बनाए.

वर्तमान में भारत ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी नीतियों के तहत खुद को एक उत्पादन और आर्थिक शक्ति के रूप में स्थापित कर रहा है.

5. सुपरपावर बनने की ओर अग्रसर (वर्तमान और भविष्य):

भारत वर्तमान में वैश्विक मंचों पर जैसे कि G20, QUAD, और BRICS में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है. इसके अलावा यह देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लीन एनर्जी, और स्टार्टअप इकोसिस्टम में उभरती हुई ताकत बन रहा है.

भारत को जलवायु परिवर्तन, गरीबी उन्मूलन, और शिक्षा व स्वास्थ्य सुधार की चुनौतियों का सामना करना है, लेकिन इनसे निपटने के लिए भारत की क्षमता भी निरंतर बढ़ रही है. देश की इस यात्रा में कई महान नेताओं, सेनानियों, और आम जनता का योगदान रहा है, जिन्होंने भारत को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त कराकर एक स्वतंत्र और सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है. आज, भारत अपने इतिहास से प्रेरणा लेकर भविष्य की चुनौतियों का सामना कर रहा है और सुपर पावर बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है.

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